मुड़कुम में बोड़ाम बाटिया का हुआ आयोजन…..टूटी टोकरी, झाड़ू, राख से भगाते है अनहोनी

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सरायकेला-खरसावां, झारखंड. आधुनिकता के इस युग में भी कई प्राचीन प्रथा ऐसी है, जो आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लोग आस्था के साथ निभाते आ रहे है. कुछ इसी प्रकार की प्रथा गम्हरिया प्रखंड के यशपुर पंचायत अंतर्गत मुड़कुम में माझी बाबा जोगेंद्र मार्डी के नेतृत्व में ग्रामीणों द्वारा निभायी गयी, जहां टूटी हुई टोकरी, झाडू व राख से गांव में आने वाले बाधा-विघ्न व अनहोनी को भगाने की प्रथा निभायी गयी. वहीं ग्रामीणों ने बताया कि इस नियम से गांव में सुख, शांति व समृद्धि आती है. साथ ही गांव से रोगों का पलायन होता है.

नायके बाबा बिदूर टुडू ने बताया कि उनके द्वारा इस प्रथा को विगत सौ वर्षो से निभायी जा रही है, जो आज भी उसी प्रकार आस्था व विश्वास के साथ मनाया जा रहा है. इस मौके पर पुजारी रूपाय मार्डी, काश्मीर टुडू, निताय माझी, मार्कंड मार्डी, विष्णु मार्डी, राजेश मुर्मू, रमेश मार्डी, लील मुर्मू समेत काफी संख्या में ग्रामीण शामिल थे.


बोडाम बाटिया कहा जाता है
ग्रामीणों द्वारा निभायी गयी प्रथा को ग्रामीण बोड़ाम बाटिया के नाम से जानते हैं. इस प्रथा के अनुसार गांव के प्रत्येक घर से ग्रामीण एक टूटी टोकरी, एक टूटा झाडू व कोयले की कुछ राख एकत्रित करते हैं. इसके बाद ग्रामीणों द्वारा एकत्रित सामग्रियों को श्मशान या गांव के सीमा से बाहर फेंक दिया जाता है.


श्मशान में मुर्गा छोड़ दूर की जाती है बाधाएं
बोड़ाम बाटिया की प्रथा को निभाने से पूर्व ग्रामीणों द्वारा गांव में स्थित जाहेरथान में एक मुर्गा की पूजा की जाती है. मान्यता के अनुसार पूजा के पश्चात ग्रामीणों द्वारा गांव में आने वाले बाधाओं को उस मुर्गे के माध्यम से गांव के बाहर श्मशान में छोड़ दिया गया, ताकि गांव में किसी प्रकार की अनहोनी न हो.


सामूहिक वनभोज का हुआ आयोजन
बोड़ाम बाटिया के बाद ग्रामीणों द्वारा गांव के बाहर सामूहिक वनभोज का आयोजन किया जायेगा, जिसमें सिर्फ गांव की महिलाएं व बच्चे ही शामिल हुए.

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