लॉकडाउन में हुआ बेरोजगार तो स्वरोजगार से जुड़ा मंगल, अब 40 दिन मेहनत कर कमा रहा अच्छी आमदनी

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सरायकेला-खरसावां, झारखंड. कई लोग ऐसे है, जो बेरोजगारी से तंग आकर गलत कदम उठा लेते है. वैसे लोगों को गम्हरिया प्रखंड अंतर्गत रापचा पंचायत के 30 वर्षीय युवा मंगल सिंह सरदार से सीख लेने की जरूरत है. मंगल अपने जीवन में कई बार असफल हुए, लेकिन कभी हताश नहीं हुआ और संघर्ष जारी रखा. उसकी लगन व आत्मविश्वास की वजह से आज वह स्वरोजगार से जुड़कर महज 40 दिनों की मेहनत कर अच्छी आमदनी कर रहा है.

मंगल ने बताया कि वह बचपन से ही मेहनत करते आ रहा है. पहले गांव में ही लोगों का गाय-बैल चराकर अपने माता-पिता को सहयोग करता था. इसके बाद कई कंपनियों में मजदूरी भी की. इसी बीच लॉकडाउन की वजह से उसका काम छूट गया और वह बेरोजगार हो गया. इस दौरान काम की तलाश में वह कई जगह भटका, लेकिन उसे कहीं काम नहीं मिला. बेरोजगारी की वजह से उसे आर्थिक संकट से भी गुजरना पड़ा, लेकिन उसने हार नहीं मानी और इस विकट परिस्थिति से डटकर सामना किया.

इस दौरान मूसरीकूदर निवासी जगन्नाथ टुडू ने उसे अपने मुर्गी फार्म में देखरेख के लिए काम पर रखा. करीब डेढ़ वर्ष तक श्री टुडू का सहयोग करते हुए फार्म संचालन की विधि को जाना. इसके बाद श्री टुडू के साथ ही मुर्गी पालन का काम शुरू किया, जिसे वह आज भी सफल तरीके से चलाते आ रहा है. यही नहीं मंगल अपने फार्म में कुछ लोगों को काम पर भी रखा है. साथ ही मुर्गी पालन करने के इच्छुक युवाओं को प्रशिक्षण भी देता है.
40 दिनों की देखभाल के बाद बेचने लायक हो जाता है चूजा
मंगल ने बताया कि वर्तमान में वह चार हजार चूजों को फार्म में रखकर देखभाल कर रहा है. सभी चूजा 40 दिनों में दो से ढाई किग्रा तक का बन जाता है. उन्होंने बताया कि 40 दिन के बाद बाहर से व्यापारी आते है. उनके द्वारा पुनः चूजा देते हुए मुर्गियों को ले जाते है. वहीं प्रति क्विंटल के हिसाब से मुर्गियों का पैसा देते है. इस दौरान करीब डेढ़ से दो सौ चूजा मर भी जाता है. इससे उन्हें मामूली सा नुकसान भी सहना पड़ता है.

मंगल सिंह सरदार


सरकारी सहायता मिलता तो शायद और बेहतर कर पाते
मंगल ने बताया कि वह अब तक मुर्गी पालन में जो भी किया है वह निजी खर्चे से ही करते आ रहा है. मुर्गियों के बिक्री से मिलने वाले पैसा से ही वह चूजों के लिए खाद की व्यवस्था के साथ-साथ देखभाल भी करता है. स्वरोजगार के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं चला रही है. अगर सरकारी स्तर पर मुझे भी कुछ सहयोग मिलता तो शायद इससे भी बेहतर कर पाता. मंगल ने बताया कि वह प्लम्बर का भी काम करता है. उससे अर्जित पैसा को वह मुर्गी पालन में लगाता है.


21 वर्ष पहले पिता का हुआ निधन, सात वर्ष पहले मां चल बसी
मंगल का परिवार में तीन भाई व दो बहन है. 21 वर्ष पहले उसके पिता की मृत्यु हो गयी, जबकि सात साल पहले मां का निधन हो गया. माता-पिता के निधन के बाद सबका पालन पोषण का बोझ मंगल पर ही आ गया. इस दौरान वह पढ़ाई छोड़ रोजगार की तलाश में लग गया. मुर्गी पालन का पैसा से ही उसने अपनी दीदी की शादी दी, जबकि छोटी बहन को डिप्लोमा करवाया. फिलहाल उसकी छोटी बहन दुबई में काम कर रही है. वहीं तीन भाइयों में दो की भी शादी हो चुकी है.


सरकारी स्तर पर हर संभव किया जायेगा सहयोग : बीडीओ
मंगल के इस कार्य को बीडीओ अभय कुमार द्विवेदी ने सराहना करते हुए सरकारी स्तर पर हर संभव सहयोग करने की बात कही. उन्होंने कहा कि मुर्गी पालन के साथ-साथ अंडा उत्पादन भी किया जा सकता है, जिसकी वर्तमान समय में बहुत मांग है. विद्यालयों में भी एमडीएम के लिए उपयोग में आयेगा. ऐसे युवाओं को प्रोत्साहित करने से अन्य शिक्षित युवाओं को भी स्वरोजगार से जुड़ने की प्रेरणा मिलेगी.

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